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Install NS 2.35 from source packages on Fedora 16

I assume that the Fedora Installation you have on your system have minimal packages and installed with GNOME desktop. Though it's optional, you can check for existing installation of package, by typing " rpm -qa | grep <pkg_name> ", in our case, i.e. Perl. If not present, I prefer installing Perl binaries from Fedora repository only. To do that (as you are reading my blog here, I assume your system is connected to Internet), type below command:                          [root@fedora32 ~]# yum install perl This will install Perl-5.14.2-198 . fc16.i686 package and other related Perl packages as per requirement. Also install various dependencies which will come in course of compiling and "configure/make" of required source packages by typing below commands. [root@fedora32 ~]# yum install gcc gcc-g++ [root@fedora32 ~]# yum install libX11-devel [root@fedo...

तनहा

जब तनहा होता हूँ, तनहा नहीं होता, जब सब साथ होते है, तनहा होता हूँ...

शिद्दत

ना रही वो शिद्दत गम की, इक मुद्दत बाद ये इल्म हुआ, हमने तो ना चाहा था ऐसा हो मगर, जो हुआ अच्छा हुआ...

शगल

इंसानियत की बात करना, बड़े लोगों की शगल है बस, अगर नियत सही होती, तो आज ये मंजर ना होता...

दायरा

देख रहा था मैं, एकटक, टंकी मे बंद मछलियों को, रंग-बिरंगी, सुन्दर, पर शायद निरर्थक भ्रमण करती, जाने किस धुन, किस लय मे तरंगित है, काश उन्हें एहसास होता अपने सीमित दायरे की. शायद अभी तक है दबी, कहीं अन्तः मे, उसके अरमान वापस समंदर मे जाने की, आज़ादी के लिये कितना भी टकराए शीशे से, पर उसके नसीब मे शायद वो वक़्त नहीं. शायद खुश है वो इस बात से की, दरिया मे होते तो टिकते कब तक, उन पर इंसान ने किया है उपकार, उन्हें जीवित छोड़ के अब तक. फिल्मों की तरह हर कहानी का, एक निश्चित अंत नहीं होता, जीवन अगर इतनी सरल होती, तो कभी कोई संघर्ष नहीं होता. नहीं तय कब ख़त्म होगा, ये सिलसिला गुलामी का, अपने से बलवान की कमजोर पर जुल्म और मनमानी, शायद कुछ परेशानियों का हल सिर्फ मृत्यु ही है बस, चाहे उसे शहादत कह लो, आत्महत्या या क़ुरबानी. -- कृष्ण पाण्डेय

आरज़ू

आज फिर एक दिन गुजर गया, बस यूँ ही ख्यालों में, कुछ करने की चाहत तो थी, पर वजह कहीं गुम था. वजह जानने की कशमकश से बेकरार हुआ जब, हमने पाया दिल के हाथो दिमाग मजबूर था... आरज़ू थी दिल में हमारे भी ऊँची उड़ान की, मगर सारी ख्वाहिशें गुम थी और थे अपने साये, शायद इंतजार है फिर से किसी हमसफ़र का, जिसके साथ मंजिल का मजा राह में ही आये... सुना है उम्मीद पे दुनिया पे कायम है, हम भी जिये जा रहे है यूँ ही, बस तलाश है फिर उस नजर की, जिसमे मेरा चेहरा नजर आये... -- कृष्णा पाण्डेय

यादें

क्या है ये यादें ? एक सफ़र - ख्यालों मे ढूँढना किसी को, जो अब करीब नहीं, या एक एहसास जो यकीन दिलाये, तुम आज भी दिल के करीब हो. है ये तुम्हारे साथ बिताये पल महसूस करने का एक ज़रिया , या दो पल का वहम जिससे दिल को सुकून मिलता हो. है  ये  गुजर  चुके  वक़्त  में  कभी  साथ  होने  की  ख़ुशी , या  फिर  भविष्य मे कभी साथ ना हो पाने का गम? तनहाई  में इंसान के साथी, या महफ़िल में गुफ्तगू के सामान, या ये है पेट भरने के बाद करने वाली, इंसानो की कोई शगल. या ये है पाप का प्रायश्चित, क्यूँ की ये अच्छा वक़्त गुजरने के बाद ही आती है. है ये कोई इस दुनिया से परे एक दूसरा जहान, जहाँ हम ज़माने की मर्ज़ी के बिना मिलते है. या ये है कोई एहसास, जो हमें एक दुसरे के दिल में जिंदा रखती है, सुखद हो तो मुस्कान वरना आँसू छोड़ जाती है. या ये इंसान के कभी हार न मानने के जिद का परिणाम है. ये आती क्यूँ  है? ताकि हम इस बात का फैसला कर सके की कौन सही था, कौन गलत, जब की इस बात से क्या फर्क पड़ता ह...